डॉकसाब, उसूल वाले 

anil saxena

लेखक अनिल सक्सेना “अन्नी”     मुझे उन लोगो से सख़्त ऐतराज है जो किसी की कमाई पर अपनी नज़रे गड़ाए बैठे रहते है। खुद से तो कुछ होता जाता है नही और बेचारा जो रात दिन अपने परिवार को पालने के लिए मेहनत कर रहा हो उससे जल जल कर खुद को भूनने मे अपना समय बर्बाद करते रहतें हैं.

अब हमारे मुहल्ले के डॉक्टर साब को ही देखिये सुबह से शाम तक मरीजों की सेवा मे अपने आप को खपाए रखते है। फिर भी न जाने क्यों, कुछ कूड़ मगज उनकी मजाक उड़ाते हुए उनके लालची होने की अफ़वाह फैलाते रहते हैं।

हमारे मोहल्ला डॉक साब रोज सुबह 8 बजे नाश्ता पानी करके अपने मरीजों की सेवा चाकरी के लिए तैयार हो जाते हैं। नाश्ता करने के तुरंत बाद उनके सामने उनका सेवक हाजिर हो जाता है और बाहर बैठे मरीजों की संख्या को, डॉक सांब की फीस से गुणा करके कुल योग बताता है। मोहल्ला डॉक साब का मानना है कि फीस की रकम सुनने से अपने काम को दिल से करने की प्रेरणा मिलती है।

एक बार उनके एक सेवक ने रुपये की जगह मरीजो की संख्या बता दी, फिर क्या था खड़े दम उसे डॉक साब ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। साथ ही इस घटना के side effect हुए , सो अलग। मूड खराब होने के कारण उस दिन कई मरीजों को दवाई के साइड इफ़ेक्ट को झेलना पड़ा।

इसलिए डॉक साब ने कोई चिंगारी आग न बन जाये इसका पुख्ता इंतज़ाम कर रखा है।
मरीजों का पूरा ध्यान रख के इलाज करना ही उन्होंने अपना मुख्य उद्देश्य बना लिया है। मरीज अपनी बीमारी के प्रति लापरवाह ना हो इसलिए मरीज को उसकी बीमारी को दो से गुणा करके बताते हैं, ताकि वो अपनी सेहत का ज्यादा अच्छे से ख्याल रख सके। वो मरीज के मर्ज को अपनी मुट्ठी मे जकड कर रखते हैं, ताकि उसे भागने का कोई अवसर हाथ ना लगे। मरीज की हर गतिविधि पर उनकी पैनी नज़र होती है। उसे कौन से Diagnostic center मे टेस्ट कराना है और किस विशेष दुकान से दवाई लेनी है, यह मार्गदर्शन करना वह कभी नही भूलते है।
यहाँ तक की नए मरीजों से दवाई का बिल भी देखने के बहाने माँगते है ताकि संतुष्टि कर सके कि दवा अधिकृत दुकान से ही खरीदी गयी है। अब यदि ख़ुद मरीज उनकी सलाह ना मानते हुए टेस्ट या दवाई खरीदने मे कोई गलती कर दे तो फिर यह तो धोखा ही हुआ ना। जब मरीज को डॉक्टर पर भरोसा नहीं है तो इसका मतलब,उसे भगवान पर भी भरोसा नही है। आखिर डॉक्टर भगवान का ही तो प्रतिबिम्ब होता है। भगवान भी तो दुष्कर्मों को सजा देते है, फिर ऐसे मे यदि भगवानरूपी डॉक्टर मरीज को थोड़ा कष्ट दे दे तो इसमें बुराई की क्या बात है।
इसीलिए डॉकसाब ने सिद्धांतों से कभी समझोता नही किया।

नियम के अनुसार 11 बजे तक मरीजों को देखकर वो रोज इस बात की ताकीद कर लेते है कि कितने मरीजों ने अपना टेस्ट सही जगह करवा लिया है। मरीज के पीछे से उसका ख्याल रखना और उसके बदले मे थोड़ा बहुत कमीशन ले लेना वो कतई गलत नही मानते हैं। अब उन्होंने कोई चेरिटी होम तो खोला हुआ है नही, अपनी मेहनत का पारिश्रमिक ही तो ले रहे हैं।

एक बार किसी सिरफिरे युवा पत्रकार ने जब उनसे पूछा कि क्या यह उचित है कि एक डॉक्टर कमीशन खाए। यह सुन डॉकसाब एकदम भड़क गए। पत्रकार के दोनों शब्द “कमीशन और खाए” तीर की तरह उनके मासूम दिल में चुभ गए। ठंडी साँस लेकर उन्होंने पहले तो उस पत्रकार को यह समझाया कि प्रश्न पूछते समय किन उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहिए और किनका नही। फिर उन्होंने कर्म कि व्याख्या कर उस पत्रकार का ह्रदय परिवर्तन कर दिया। उन्होंने उस पत्रकार को यह समझाया कि हर सफल व्यापारी इसलिए सफल होता है क्यों कि वो एक प्रोडक्ट के भरोसे नही रहता। वो और दूसरे आउट लेट भी खोलता है। जैसे टाटा यदि ट्रक बनाता है तो नमक भी बेचता है। फिर उन्होंने उस युवा पत्रकार की आँखों मे आँखें डाल कर सवाल दाग दिया कि तुम्हे कोई ऐसे सफल व्यवसायी का नाम पता है जो किसी एक ही प्रोडक्ट के भरोसे ऊंचाई छू गया हो ? पत्रकार जी जब बगले झाँकने लगे तब तुरंत उन्होंने एक injection अपने सवाल का और ठोक दिया। तुम बताओ मैं क्या गलत करता हूँ यदि अपने मरीज का सही इलाज करता हूँ, उसे सही दुकान और लेबोरेटरी भेजता हूँ और मेहनत के दो पैसे कमा लेता हूँ। पत्रकार महोदय हां या ना मे कुछ बोलते इससे पहले ही डॉकसाब ने एक सलाह और उन पर चिपका दी कि तुम भी पत्रकारिता के साथ कोई और धंधा शुरू कर दो। अभी जवान हो, अपनी नींव मजबूत करोगे तो आनेवाले समय मे मीठे फलो का स्वाद चखोगे। युवा पत्रकार का ह्रदय गदगद हो गया। उसका मन तो हो रहा था कि इस झरने मे डुबकी लगाकर भवसागर पार कर ले पर अपनी भावना को नियंत्रित करते हुए उसने डॉकसाब के पुनः दर्शन की आशा के साथ विदाई लेनी चाही। उदारवादी डॉकसाब ने जाते हुए पत्रकार के झोले मे उनकी माँ के लिए कुछ प्रोटीन की बोतलें भी रख दी,और माँ का ख्याल रखने की सलाह भी दे डाली। पत्रकार जी नत मस्तक हो गए। उसे ऐसा लगा कि जैसे आज ही उनके ज्ञान के चक्षु खुले हों। वो डॉकसाब को दुआ देते हुए अपनी मोटर साइकल बैठ रवाना हो गया। उधर डॉकसाब ने अपने आप को मरीजो की निस्वार्थ सेवा मे समर्पित कर दिया।

 

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